Saturday, May 2, 2020

Ziyafat;भोज;ضیافت ; Afsancha;लघु कहानी ;افسانچہ

Ziyafat;भोज;ضیافت 
 Afsancha;लघु कहानी ;افسانچہ 

भोज
निदेशक डाक सेवा की हैसियत से मैं अचानक एक दिन एक गांव के शाखा डाकघर का निरीक्षण करने चल पड़ा। साथ में एक इंस्पेक्टर था। वहां पहुँचते ही मालूम हुआ कि शाखा डाकपाल कई दिन पहले शहर जा चूका है और अपने बदले चचेरे भाई को काम पर छोड़ा है। बेचारा प्रशिक्षित तो था नहीं इस लिए ना हिसाब-किताब ढंग से रखा था और ना ही मेरे प्रश्नों का उत्तर दे पाया। 
इसी बीच में असली डाकपाल की पत्नी वहां आन पहुंची और छाती पीटती  हुई स्थानीय भाषा में तदर्थ डाकपाल को बुरा भला कहने लगी, "अरे मूर्ख, तुमने मुझे खबर क्यों नहीं की, मालूम नहीं तुम्हारा भाई आग बबूला हो जाए  गा? यह अफसर लोग जब भी आ जाते हैं हम उनकी आवभगत में  कोई कसर नहीं छोड़ते, उनके लिए फटाफट बतख कटवा कर स्वादिष्ट भोजन का प्रबंध करते हैं। यह लोग पेट भर कर ही यहाँ से चले जाते हैं।  तुमने तो भाई को मुंह दिखाने के योग्य ही नहीं रखा।"
चूंकि मैं स्थानीय भाषा जानता था इसलिए मुझे हंसी आगई। फिर उसे कहने लगा, "मोहतरमा, आप चिंता ना करें, वह जो निरीक्षण करने आते हैं बहुत बड़े अफसर होते हैं, मैं तो छोटा सा कर्मचारी हूँ कुछ जानकारी एकत्रित करने के लिए आया हूँ, बस पांच दस मिनट में वापस चला जाऊँ गा। आप निश्चिन्त अपने घर वापस चली जाइए।"
उसके बाद डाकपाल की पत्नी तदर्थ डाकपाल को बुरा भला कहती हुई चली गई। 

             


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