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Monday, May 4, 2020

Pashemani;पश्चाताप;پشیمانی ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Pashemani;पश्चाताप;پشیمانی 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

पश्चाताप 
कुछ महीने पहले राजनाथ की अर्धांगिनी स्वर्गवास हो गयी और ढलती आयु में उसे तन्हाई का अत्यंत अनुभव हो रहा था। उसे याद आया को जब भी वह कोई आदेश देता सरला बिना किसी बहाने के उस पर शीघ्र कार्यवाही करती। कभी कभी वह नाराज़ होकर आपे से बाहर भी हो जाता मगर सरला ख़ामोशी से अपने आंसू पी जाती। 
दो दिन पहले मैं यूँही उसे मिलने गया  तो वह बहुत ही अनुतापी लग रहा था। उसकी आँखों में पहली बार आंसों नज़र आ रहे थे। पूछा क्या बात है? कहने लगा, "तुम्हें नहीं मालूम तुम्हारी आंटी को मैंने ज़िन्दगी भर बहुत कष्ट पुहंचाया। सारी उम्र वह मेरे उचित अनुचित आदेशों का पालन करती रही परन्तु मुंह से कभी उफ़ तक नहीं की। मुझे अब इस बात का एहसास हो रहा है कि मैंने उस के साथ बहुत ज़्यादती की जो मुझे नहीं करनी चाहिए थी। मुझे सरला के साथ अनुकंपा तथा सहानभूति से पेश आना चाहिए था। मगर अब तो वह चली गई  और गया समय वापस नहीं आता।  



















Saturday, May 2, 2020

Ziyafat;भोज;ضیافت ; Afsancha;लघु कहानी ;افسانچہ

Ziyafat;भोज;ضیافت 
 Afsancha;लघु कहानी ;افسانچہ 

भोज
निदेशक डाक सेवा की हैसियत से मैं अचानक एक दिन एक गांव के शाखा डाकघर का निरीक्षण करने चल पड़ा। साथ में एक इंस्पेक्टर था। वहां पहुँचते ही मालूम हुआ कि शाखा डाकपाल कई दिन पहले शहर जा चूका है और अपने बदले चचेरे भाई को काम पर छोड़ा है। बेचारा प्रशिक्षित तो था नहीं इस लिए ना हिसाब-किताब ढंग से रखा था और ना ही मेरे प्रश्नों का उत्तर दे पाया। 
इसी बीच में असली डाकपाल की पत्नी वहां आन पहुंची और छाती पीटती  हुई स्थानीय भाषा में तदर्थ डाकपाल को बुरा भला कहने लगी, "अरे मूर्ख, तुमने मुझे खबर क्यों नहीं की, मालूम नहीं तुम्हारा भाई आग बबूला हो जाए  गा? यह अफसर लोग जब भी आ जाते हैं हम उनकी आवभगत में  कोई कसर नहीं छोड़ते, उनके लिए फटाफट बतख कटवा कर स्वादिष्ट भोजन का प्रबंध करते हैं। यह लोग पेट भर कर ही यहाँ से चले जाते हैं।  तुमने तो भाई को मुंह दिखाने के योग्य ही नहीं रखा।"
चूंकि मैं स्थानीय भाषा जानता था इसलिए मुझे हंसी आगई। फिर उसे कहने लगा, "मोहतरमा, आप चिंता ना करें, वह जो निरीक्षण करने आते हैं बहुत बड़े अफसर होते हैं, मैं तो छोटा सा कर्मचारी हूँ कुछ जानकारी एकत्रित करने के लिए आया हूँ, बस पांच दस मिनट में वापस चला जाऊँ गा। आप निश्चिन्त अपने घर वापस चली जाइए।"
उसके बाद डाकपाल की पत्नी तदर्थ डाकपाल को बुरा भला कहती हुई चली गई। 

             


Thursday, April 30, 2020

Kaudi Ke Teen Teen;कौड़ी के तीन तीन;کوڑی کے تین تین ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Kaudi Ke Teen Teen;कौड़ी के तीन तीन;
کوڑی کے تین تین 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

कौड़ी के तीन तीन
गरीबों की समस्याएं भी विचित्र होती हैं। मेरे फूफा जी श्रीनगर से साठ किलोमीटर दूर रहते थे। उनके जन्म दिन पर पिता जी उन्हें इक्यावन रुपए शगुन के तौर पर मेरे हाथ भेजना चाहते थे। एक दिन पहले दफ्तर जाते समय उन्होंने इकहत्तर रुपए मेरे हाथ में यह कहकर थमा दिए कि इक्यावन रुपए फूफा जी को देना और बीस रुपए बस में आने जाने का किराया। 
उस दिन मैं रात गए घर लौट आया कि रास्ते में एक चटाई विक्रेता मिल गया जिस के सिर पर केवल तीन घास की चटाइयां (वगुव) बची थीं। यह चटाइयां अत्यधिक ठंड से बचने के लिए बहुत लाभदायक होती हैं। मैंने यूँही क़ीमत पूछी तो उसने एक की क़ीमत सौ रुपए बताई और तीन ढाई सौ रुपए में देने को तैयार हो गया। मैंने कहा कि मेरे पास केवल सत्तर रुपए हैं, अगर तीनों दोगे तो खरीद लूँ गा। बहुत भाव-ताव के बाद वह मान गया और मैं तीनों चटाइयां लेकर जोशपूर्ण घर पहुँच गया। सोचा था पिता जी इतनी सस्ती चटाइयां देखकर बहुत प्रसन्न होंगे मगर वह तो आग बबूला हो गए। चूँकि महीना समाप्त होने में अभी दो दिन बाक़ी थे, उनके पास बस यही इकहत्तर रूपए बचे थे और उन्हें किसी से उधार लेना गवारा न था। 
दुसरे रोज़ प्रातः उठ कर ना जाने कहाँ से वह लाचारी में सत्तर रुपए उधार ले कर आए और मेरे हवाले कर दिए। उनके चेहरे पर सतत क्रोध और उदासी देख कर मुझे शर्म महसूस हो रही थी और एक कश्मीरी कहावत याद आ रही थी, 'हारि हुस करि क्या हारि रुस' (कौड़ी के सब जहाँ में नक़्शो नगीन हैं. कौड़ी न हो तो कौड़ी के फिर तीन तीन हैं [नज़ीर ])

 
        

Tuesday, April 28, 2020

Katba...!;शिलालेख;!...کتبہ ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Katba...!;शिलालेख;!...کتبہ 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

शिलालेख.....! 

यहाँ एक बेसहारा अनपढ़ औरत दफ़न है जो सारी उम्र अपने लेखक पति के झूठे आरोपों का उत्तर नहीं दे पाई। 


Monday, April 27, 2020

Shutur Murgh; शुतुरमुर्ग; شتر مرغ ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Shutur Murgh; शुतुरमुर्ग; شتر مرغ  
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

शुतुरमुर्ग  

मैं उठा और खिड़की का पर्दा हटाया। 
बाहर नरसंहार हो रहा था और मकान जल रहे थे जिनके धुंए से कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था। तथापि इतना तो स्पष्ट था कि यह सब कुछ मेरे मकान से बहुत दूर हो रहा था। इसलिए मैंने भगवान् का  शुक्र अदा किया। मैं वापस अपनी रज़ाई में शुतुरमुर्ग की तरह सिर दबाये घुस गया और निश्चिन्त सो गया। 

Sunday, April 26, 2020

Jahez Ki Karamaat;दहेज का चमत्कार;جہیز کی کرامات ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Jahez Ki Karamaat;दहेज का चमत्कार;جہیز کی کرامات 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

दहेज का चमत्कार 
यह उन दिनों की बात है जब मैं अशोक होटल दिल्ली के कश्मीर गवर्नमेंट एम्पोरियम ब्रांच में मैनेजर था। वहां के टेलीफोन एक्सचेंज का इंचार्ज मेरा अच्छा मित्र बन गया। मैं अक्सर उसके पास चाय या कॉफ़ी पीने के लिए चला जाता और बहुत समय तक गप्पें हांकता। विनायक अग्रवाल की काय  मध्यम, रंग सावंला,और शरीर मांसल था। परन्तु मिलनसार और मृदुभाषी था। 
एक रोज़ उसने मुझे सूचना दी कि दो दिन पहले उसकी मंगनी हो गयी और शादी दुसरे महीने होने वाली है। बातों बातों में यह भी बताया कि उसे तीन  लाख रुपए दहेज के तौर पर मिल रहे हैं। उन दिनों लाखों का महत्व उतना ही होता था जितना आज कल करोड़ों का होता है। मुझे आश्चर्य हुआ कि विनायक में ऐसे कौन से सुरखाब के पर लगे हैं जिसके कारण इतना सारा दहेज मिल रहा है। 
खैर विवाह हुआ और मैं भी अतिथि के तौर पर सम्मिलित हुआ। उसकी धर्मपत्नी के दर्शन करते ही मेरा दिल धक् से रह गया। मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया कि अग्रवाल इतने महंगे दामों क्यूँकर बिक गया। उसकी अर्धांग्नी भारी भरकम, श्याम वर्ण और कुछ हद तक कुरूप थी। देखने में वह उसकी माँ जैसी लग रही थी।     



Saturday, April 25, 2020

Yeh Kaisa Rishta: यह कैसा रिश्ता; یہ کیسا رشتہ ;Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Yeh Kaisa Rishta: यह कैसा रिश्ता; یہ کیسا رشتہ 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

यह कैसा रिश्ता !
मैं और मेरी पत्नी तेजपुर असम से वापस टँगावैली, अरुणाचल प्रदेश जा रहे थे कि रास्ते में सेसा के पास चाय नाश्ता करने के लिए रुक गए। रेस्टोरेंट में प्रवेश करते ही मेरी दृष्टि एक अधीनस्थ अफसर पर पड़ी जो टँगावैली में अपने फील्ड पोस्ट ऑफिस का निरीक्षण करके वापस अपने हेडक्वार्टर जा रहा था। उसके साथ एक सांवली महिला थी जो देखने में कुछ जवान लग रही थी। उसने हमें अपने पास बैठने के लिए आमंत्रित किया और हम दोनों के लिए डोसा और चाय का आर्डर दे दिया। 
बहुत देर तक मैं ऑफिस की बातें करता रहा जबकि मेरी श्रीमती जी बिलकुल खामोश रही। मुझे कुछ संदेह सा हो गया क्यूंकि वह बात करने के बग़ैर रह ही नहीं सकती। खैर नाश्ता करने के पश्चात् जब हम एक दुसरे से विदा हो गए तो मैंने अपनी पत्नी से रोष प्रकट किया, "तुमने उसकी बीवी से बात क्यों नहीं की, तुम अपने आप को ना जाने क्या समझती हो?"
"वह कौन सी उसकी बीवी है, वह तो उसकी बहु है जिस को वह अपने पास रखता है जबकि अपनी बीवी को बेटे के पास रख छोड़ा है।" उसने शरारत भरे लहजे में उत्तर दिया।  

   
 





Hum Gudaz; स्नेहवान; ہم گداز ; Afsancha; लघुकहानी ;افسانچہ

Hum Gudaz; स्नेहवान; ہم گداز 
 Afsancha; लघुकहानी ;افسانچہ 

स्नेहवान 
रास्ते में वह मुझ से अचानक टकरा गयी और फिर मेरे साथ चलने को तैयार हो गयी। संयोग से मैं उन दिनों एक घनिष्ट मित्र के माध्यम से एक संसद सदस्य के फ्लैट में दो दिनों के लिए ठहरा हुआ था क्यूंकि उस समय संसद सत्र नहीं चल रहा था। घर में प्रवेश करके मैंने उसको आराम और संतोष से बैठने को कहा। कुछ समय तक किसी हिचकिचाहट के बग़ैर बातें हुईं। फिर वह उठी, बाथरूम में नहा-धो लिया, खुशबूदार साबुन और इत्र से अपना बदन महकाया और बालों को खुला छोड़ कर अपनी छातियों पर तौलिया बांधे बाहर निकल आई जैसे मुझसे कोई पर्दादारी ना हो। उसके बाद हम दोनों बियर पीने में व्यस्त हो गए। इतने में मैंने होम डिलीवरी से खाना मंगवाया और फिर दोनों उत्साह से भोजन करने लगे यहाँ तक कि एक दुसरे के मुंह में भी कुछ प्यार भरे निवाले डाल दिए। 
रात कैसे व्यतीत हुई इस का आभास ही नहीं हुआ। प्रातः प्रस्थान के समय मैंने उसे पांच सौ रुपए देने की कोशिश की मगर उसने लेने से इंकार कर दिया। प्रतिक्रिया के तौर पर वह केवल मुस्कराती रही और ऑटो रिक्शा में बैठकर दिल्ली की भीड़ में खो गयी।    




Thursday, April 23, 2020

Liaison Officer:संपर्क अधिकारी ;لیازن افسر : Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Liaison Officer:संपर्क अधिकारी ;لیازن افسر 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

संपर्क अधिकारी 
स्वामीजी से मेरा परिचय मकान मालिक गोविन्द गोस्वामी ने कराया। वह उसका छोटा भाई था। अर्धांगिनी के स्वर्गवास होने के बाद स्वामीजी ने अपनी बेटी को उसकी नानी के घर छोड़कर सन्यास  लिया था। गोविन्द ने स्वामीजी को बताया कि शिक्षित होने के बावजूद मुझे उपयुक्त नौकरी नहीं मिली है। 
बात चीत के दौरान स्वामीजी ने यह भेद खोला कि उसके शिष्यों में आयात निर्यात से जुड़े कई बड़े अफसर हैं जिनके माध्यम से उसने अपने कई व्यापारी शिष्यों को आयात निर्यात के लाइसेंस दिलवाये। अब वह इस फ़िक्र में है कि बेटी के भविष्य  के लिए स्वयं एक एक्सपोर्ट हाउस खोल ले जिसके लिए उसे एक संपर्क अधिकारी की आवश्यकता होगी। स्वामीजी के अनुसार मुझसे बेहतर बुद्धिमान और शिक्षित युवक कहाँ मिले गा।
मैं उसके प्रस्ताव से तुरंत प्रसन्न हुआ परन्तु थोड़ी देर के बाद मुझे ख्याल आया कि कहीं स्वामीजी मुझे चारा तो नहीं डाल रहा है और बाद में मुझे अपनी बेटी से विवाह करने के लिए मजबूर करेगा। ना जाने कैसी होगी.....? बहुत सोच विचार करके मैंने उत्तर दिया। "वास्तव में  स्वामीजी मैं केवल शिक्षक की नौकरी का इच्छुक हूँ। बिज़नेस मैनेजर तो इस समय भी हूँ मगर इसमें मुझे कोई रूचि नहीं है।"   

 

Wednesday, April 22, 2020

Ahde Hazir Ka Farhaad;नवीन काल का फरहाद; عہد حاظر کا فرہاد; (Urdu/Hindi); Afsancha; लघु कहानी ;افسانچہ

Ahde Hazir Ka Farhaad;नवीन काल का फरहाद 
عہد حاظر کا فرہاد 
 Afsancha; लघु कहानी ;افسانچہ 

नवीन काल का फरहाद 
मांझी के नगर से अस्पताल 55 किलोमीटर दूर था मगर पहाड़ी रास्ते से केवल 15 किलोमीटर रह जाता था। पर्वतीय मार्ग से उसने यह दूरी पैदल तय कर ली। कंधे पर कराहती हुई उस की ज़ख़्मी धर्मपत्नी थी जिसकी सांसें उखड रही थीं। वह जैसे गया वैसे ही लौट आया। फ़र्क़ केवल इतना था कि वापसी पर फाल्गुनी कफ़न में लिपटी हुई थी। 
उसने संकल्प लिया कि वह पर्वत काट कर छोटे नगर और शहर के बीच रास्ता निकाले गा। दुसरे दिन वह उठा और हथोड़ा, छेनी और टोकरा लेकर चल पड़ा। बाईस वर्ष वह हर दिन धरती का कुछ हिस्सा समतल कर लेता, पर्वत काटता, गहरे गड्डे भर देता और बड़े बड़े पत्थरों को कूट कर उन्हें समतल की हुई ज़मीन पर बिछा देता। गांव के लोग उसे बावला समझने लगे। धीरे धीरे सड़क आगे बढ़ती गयी और तमाशा  देखने वालों की भीड़ कम होती गई। फिर एक दिन ऐसा आया कि पर्वतीय सड़क तैयार हो गई जिस पर कंकड़ बिछे हुए  थे और बेल गाड़िया तथा अन्य परिवहन के साधन आसानी से चल रहे थे। 
उस दिन मांझी बहुत प्रसन्न हुआ। वह घर में जाकर अपनी अर्धांग्नी के फोटो से बातें करने लगा, "फाल्गुनी, मैं तुम्हारी ज़िन्दगी तो बचा ना पाया मगर अब और किसी की ज़िन्दगी नष्ट नहीं होगी।"       

Tuesday, April 21, 2020

Keena Toz:کینہ توز ;विद्वेषी : (Urdu/Hindi); Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Keena Toz:کینہ توز ;विद्वेषी 
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विद्वेषी 
वह अपनी बेटी से जितना प्यार करता था उतनी ही नफरत उसकी माँ से करता था यहाँ तक कि उसकी उपस्थिति से विकल होता था। अंततः दोनों का तलाक़ हो गया और पिता ने बेटी को माँ से छीन कर अपने पास रख लिया। 
बेटी पढ़ लिख कर जवान हो गई और डॉक्टर बनकर अमेरिका चली गई। माँ की जुदाई ने उसे खिन्न और प्रतिशोधी बना दिया था। अंततः वह फेसबुक के माध्यम से अपनी माँ को ढूंढने में सफल हो गई और फिर भारत आकर उसको अपने साथ ले गई। 
वृद्ध पिता को खर्चे के लिए वह अमेरिका से रुपये भेजती रही मगर उसको देखने की इच्छा कभी ना हुई। उन दिनों भी नहीं जब वह प्राणनाशक कैंसर में ग्रस्त अस्पताल में तड़प रहा था। 



Budhape Ka Sahara:بڑھاپے کا سہارا ;बुढ़ापे का सहारा : (Urdu/Hindi); Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Budhape Ka Sahara:بڑھاپے کا سہارا 
बुढ़ापे का सहारा 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

बुढ़ापे का सहारा 
युवावस्था में दोनों पति पत्नी लड़के की कामना में एक के बाद एक बच्चे पैदा करते रहे। बेटा तो पैदा हुआ नहीं परन्तु तीन लड़कियों ने जन्म लिया जिनमें से एक पोलियो ग्रसित होने के कारण विकलांग थी। ज़िद्दी पत्नी की वजह से पिता पलायनवादी बन गया। डाक विभाग में मामूली सी नौकरी करने के बाद सेवानिवृत हुआ। उसे ना तो लड़कियां जवान होते नज़र आईं और ना ही उनका घर बसाने की कभी कोई चिंता की। अब तो ना पैसा था और ना  ही बल। उधर घरवाली वैसे ही निठल्ली थी और तबियत से आक्रामक भी। बड़ी लड़की का विवाह हो गया परन्तु कुछ महीनों में ही वह वापस आकर मायके में आकर बैठ गई और एक मानसिक रूप से विक्षिप्त बेटे को जनम दिया। 
घर का सहारा थी तो बस दूसरी शिक्षित बेटी ऋद्धिमा  जिसे भाग्य ने साथ दिया और खाड़ी में नौकरी मिल गई। वह घर के लिए टकसाल बन गई। प्रायः माता-पिता की अभिलाषा होती है कि लड़की के हाथ जल्दी से पीले हूँ लेकिन यहाँ माजरा उसके उलट था। ऋद्धिमा अपनी तेज़ी से बढ़ती उम्र की अनदेखी करती हुई माता-पिता और बहनों को संभालने में जुट गई यहाँ तक कि उसके बालों में चांदी के तार नज़र आने लगे। 
इससे क्या कहिए, माता-पिता की परजीविता या फिर संतान का प्रार्थभाव, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।  



Monday, April 20, 2020

Talbees: تلبیس ; छद्मावरण ; Afsancha; लघु कहानी ;افسانچہ

Talbees: تلبیس ; छद्मावरण 
 Afsancha; लघु कहानी ;افسانچہ 

छद्मावरण 
सज़ा से बचने के लिए वह छद्मावरण करके तमिलनाडु से जम्मू पहुँच गया। जटाधारी, लम्बी दाढ़ी, गेरवे वस्त्र, मतलब साधु का वेश धारण कर लिया। पेट की आग बुझाने का भारतवर्ष में इससे आसान तरीक़ा और क्या हो सकता है। 
जम्मू में उन दिनों नई कॉलोनियां बस रही थीं। उसने एक खंडहर में शरण ली, साफ़ सफाई करके एक मूर्ति स्थापित की, दो चार घंटियाँ लटका दीं और खंडहर को मंदिर में बदल दिया। धीरे धीरे श्रद्धालुओं का ताँता बंध गया और वह पुजारी के रूप में उनको अमृत और प्रसाद वितरण करने लगा। समय के साथ साथ मंदिर का विस्तार होता रहा, इंसान के क़द का शिवलिंग बीचों बीच खड़ा किया गया और जगह जगह मूर्तियां लगाई गईं। प्रातः सूर्योदय से पहले और शाम सूर्यास्त के बाद मंदिर से लाउड स्पीकर पर फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी भजनों की आवाज़ें सारे इलाक़े में गूंजने लगीं। 
चूँकि यह समय पढ़ाई का होता है और कश्मीरी विस्थापित शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं, बच्चों को इस शोर-गुल के कारण कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था परन्तु कोई कुछ भी ना बोल पा रहा था कि कहीं किसी की भावनाओं को ठेस ना पहुँचे।             



Saturday, April 18, 2020

Rukawatein:रुकावटें; رکاوٹیں ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Rukawatein:रुकावटें; رکاوٹیں 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

रुकावटें

ना तो वह उसकी कोख से पैदा हुआ था और ना उसके स्तन से दूध पिया था। फिर वह उसकी माँ कैसे हुई? पिता की दूसरी शादी करने के बाद कोई उसकी माँ थोड़े ही बन सकती है? वह बहुत दिनों से इसी चिंता में छटपटा रहा था। 
फिर एक रोज़ उसे रहा ना गया वह सौतेली माँ की नखरेबाज़ी और प्रलोभन को रोक न सका। देखते ही देखते सारी रुकावटें कपूर की तरह उड़ गयीं।  

Friday, April 17, 2020

Insaaf:انصاف ;न्याय ; Afsancha; लघु कहानी ; افسانچہ

Insaaf:انصاف ;न्याय 
 Afsancha;लघु कहानी ;افسانچہ 

न्याय 

डाक सहायकों की भर्ती  हो रही थी। जिन प्रतियाशियों ने लिखित परीक्षा पास की थी  वह अब मौखिक परीक्षा देने के लिए आए थे। मेरे अलावा दो और साक्षात्कर्ता थे। तीनों मेम्बर बारी बारी प्रश्न पूछ रहे थे और फिर मार्क्स शीट पर उनके प्रदर्शन के हिसाब से नंबर दे रहे थे। 
कुछ समय के बाद एक लड़की की बारी आई। सामान्यतः उसे भी प्रश्न पूछे गए जिनमें से वह कुछ एक के उत्तर दे पाई। इससे पहले कि मैं अवार्ड शीट पर कुछ लिख देता दोनों साक्षात्कर्ता मुझसे संबोधित हुए, "सर यह लड़की हमारे ही डिपार्टमेंट के पोस्ट मास्टर की बेटी है।" वास्तव में वह इशारों में मुझे यह कहना चाहते थे कि इस लड़की को पास करलें, हम तो कर ही रहे हैं। परन्तु मेरी अन्तरात्मा ने मुझे गलत काम करने से रोक लिया। 
सारी रात मैं सो न सका क्यूंकि मेरी चेतना मुझे झिड़कती रही। "तुम्हारी इस कार्यवाही से न्याय बलि चढ़ गया। यह लड़की बाहर जहाँ कहीं भी जाये गी उसे नौकरी इसलिए नहीं मिले गी क्यूंकि वहां सिफारिश या रिश्वत चलती है। चूँकि उसका पिता एक गरीब डाकपाल है वह ना रिश्वत दे सके गा और ना ही  सिफारिश ला सके गा। बेचारी के लिए यह एक अवसर था कि सभी साक्षात्कर्ता  अपने थे परन्तु तुम्हारी ईमानदारी उसके लिए बाधा बन गई।"     

Wednesday, April 15, 2020

Kunba Parwari:کنبہ پروری भाई-भतीजावाद ; Afsancha;लघु कहानी ;افسانچہ

Kunba Parwari:کنبہ پروری ;भाई-भतीजावाद 
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भाई-भतीजावाद 

शिलांग जाते हुए मुझे सिल्चर, आसाम के गेस्ट हाउस में रुकना पड़ा। वहां से प्रस्थान करते समय मेरे ड्राइवर ने कहा, "सर यहाँ का अधीक्षक डाकघर बहुत ही भ्रष्ट है। पिछले वर्ष ग्रामीण डाक सेवकों की भर्ती के दौरान मेरी बहन ने अपने बेटे की सिफारिश करने के लिए मुझ पर ज़ोर डाला। मजबूर होकर मैंने साहब से अनुरोध किया परन्तु उसने कोई विचार नहीं किया। कुछ महीनों बाद मेरी बहन ने नाराज़ होकर मुझसे कहा, "भाई तुम पर निर्भर रहती तो कुछ भी ना होता। इंस्पेक्टर से सीधे बात कर ली, तीस हज़ार में सौदा तय हुआ और बेटा जी डी एस नियुक्त हुआ।"
मैंने कुछ अंतराल के बाद उसे पुछा, "चन्दन यह बताओ कि तुम्हारे दोनों बेटे डाक विभाग में जी डी एस पदों पर काम कर रहे हैं, उनके पास ऐसी कौन सी शैक्षिक योग्यता है जिसके आधार पर उन्हें दुसरे शिक्षित बेरोज़गारों के स्थान पर प्राथमिकता दी गयी। यह भी तो एक क़िस्म की रिश्वत ही है। कोई रिश्वत लेता है और कोई अपने परिवार के सदस्यों को नौकरी दिलवाता है। बात तो एक जैसी हुई।        



Monday, April 13, 2020

Qalam Ki Dhar: क़लम की धार; قلم کی دھار ; Afsancha; लघु कहानी ; افسانچہ

Qalam Ki Dhar: क़लम की धार; قلم کی دھار  
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क़लम की धार 

उस की तलाक़शुदा बीवी से किसी रिश्तेदार ने पुछा, "तुम्हारे बारे में तुम्हारा पूर्व-पति अनाप शनाप लिखता रहता है। वह तुम्हारे चरित्र पर हमेशा कीचड़ उछालता है। वह जो कुछ लिखता है क्या वह सच है?"
बीवी का चेहरा संजीदा और संगीन हो गया। उत्तर दिया, "उसके पास तलवार जैसी क़लम है, सच को झूट और झूट को सच बना सकता है, मैं कैसे रोक सकती हूँ। मैं ठहरी अनपढ़ गँवार औरत, अपनी सफाई किसके सामने पेश करूँ। मैं ही एक इकलौती लेखक की पत्नी तो हूँ नहीं जो अपने पति की  क़लम से लहूलुहान हो रही है, यह तो सदियों से यूँ ही चला आ रहा है।"       

Mumaniat: अस्वीकरण;ممانعت ; Afsancha;लघु कहानी; افسانچہ

Mumaniat: अस्वीकरण;ممانعت 
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अस्वीकरण 

वह बार-बार अपने अतीत को खंगालता रहता।" अगर मेरी माँ ने ज़हर खाने की धमकी ना दी होती मैं इस समय मुंबई में कस्टम्स विभाग में ना जाने किस ऊँचे पद पर विराजमान होता।" मगर अब तो एक युग बीत गया था और वह कड़वी यादें अतीत का हिस्सा बन चुकी थीं। 
आज उस का इकलौता बेटा उसके सामने प्रार्थी बना खड़ा है क्यूंकि उसको अमरीका में बहुत अच्छी नौकरी मिल रही है और वह पिता जी से अनुमति चाहता है। पिता की आँखों में आंसुओं का एक सैलाब उमड़ आया, उसने दबे स्वर में इंकार कर दिया। उसे डर है की अगर बेटा चला जाये गा तो बुढ़ापे में वह किस के सहारे जिये गा।   

Sunday, April 12, 2020

Bhadua; بھڑوا ; भडुआ ; Afsancha;लघु कहानी ; افسانچہ

Bhadua: بھڑوا; भडुआ 
 Afsancha;लघु कहानी ; افسانچہ 

भडुआ

उसके कान यह वाक्य सुनकर पक चुके थे। जबसे वह टैक्सी चलने लगा था सभी पर्यटक देर-सवेर केवल एक ही प्रश्न पूछते थे, "कुछ माल का इंतज़ाम हो सकता है।" 
उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह टैक्सी ड्राइवर नहीं बल्कि कोई भडुआ है जो दौलतमंद पर्यटकों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाने के काम पर नियुक्त हुआ है।      



Jigree-My Kinship Carer Mother

       One mother gave me birth, and the other brought me up. I am more indebted to the latter, who looked after me from the age of twelve o...