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Monday, May 4, 2020

Pashemani;पश्चाताप;پشیمانی ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Pashemani;पश्चाताप;پشیمانی 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

पश्चाताप 
कुछ महीने पहले राजनाथ की अर्धांगिनी स्वर्गवास हो गयी और ढलती आयु में उसे तन्हाई का अत्यंत अनुभव हो रहा था। उसे याद आया को जब भी वह कोई आदेश देता सरला बिना किसी बहाने के उस पर शीघ्र कार्यवाही करती। कभी कभी वह नाराज़ होकर आपे से बाहर भी हो जाता मगर सरला ख़ामोशी से अपने आंसू पी जाती। 
दो दिन पहले मैं यूँही उसे मिलने गया  तो वह बहुत ही अनुतापी लग रहा था। उसकी आँखों में पहली बार आंसों नज़र आ रहे थे। पूछा क्या बात है? कहने लगा, "तुम्हें नहीं मालूम तुम्हारी आंटी को मैंने ज़िन्दगी भर बहुत कष्ट पुहंचाया। सारी उम्र वह मेरे उचित अनुचित आदेशों का पालन करती रही परन्तु मुंह से कभी उफ़ तक नहीं की। मुझे अब इस बात का एहसास हो रहा है कि मैंने उस के साथ बहुत ज़्यादती की जो मुझे नहीं करनी चाहिए थी। मुझे सरला के साथ अनुकंपा तथा सहानभूति से पेश आना चाहिए था। मगर अब तो वह चली गई  और गया समय वापस नहीं आता।  



















Thursday, April 30, 2020

Kaudi Ke Teen Teen;कौड़ी के तीन तीन;کوڑی کے تین تین ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Kaudi Ke Teen Teen;कौड़ी के तीन तीन;
کوڑی کے تین تین 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

कौड़ी के तीन तीन
गरीबों की समस्याएं भी विचित्र होती हैं। मेरे फूफा जी श्रीनगर से साठ किलोमीटर दूर रहते थे। उनके जन्म दिन पर पिता जी उन्हें इक्यावन रुपए शगुन के तौर पर मेरे हाथ भेजना चाहते थे। एक दिन पहले दफ्तर जाते समय उन्होंने इकहत्तर रुपए मेरे हाथ में यह कहकर थमा दिए कि इक्यावन रुपए फूफा जी को देना और बीस रुपए बस में आने जाने का किराया। 
उस दिन मैं रात गए घर लौट आया कि रास्ते में एक चटाई विक्रेता मिल गया जिस के सिर पर केवल तीन घास की चटाइयां (वगुव) बची थीं। यह चटाइयां अत्यधिक ठंड से बचने के लिए बहुत लाभदायक होती हैं। मैंने यूँही क़ीमत पूछी तो उसने एक की क़ीमत सौ रुपए बताई और तीन ढाई सौ रुपए में देने को तैयार हो गया। मैंने कहा कि मेरे पास केवल सत्तर रुपए हैं, अगर तीनों दोगे तो खरीद लूँ गा। बहुत भाव-ताव के बाद वह मान गया और मैं तीनों चटाइयां लेकर जोशपूर्ण घर पहुँच गया। सोचा था पिता जी इतनी सस्ती चटाइयां देखकर बहुत प्रसन्न होंगे मगर वह तो आग बबूला हो गए। चूँकि महीना समाप्त होने में अभी दो दिन बाक़ी थे, उनके पास बस यही इकहत्तर रूपए बचे थे और उन्हें किसी से उधार लेना गवारा न था। 
दुसरे रोज़ प्रातः उठ कर ना जाने कहाँ से वह लाचारी में सत्तर रुपए उधार ले कर आए और मेरे हवाले कर दिए। उनके चेहरे पर सतत क्रोध और उदासी देख कर मुझे शर्म महसूस हो रही थी और एक कश्मीरी कहावत याद आ रही थी, 'हारि हुस करि क्या हारि रुस' (कौड़ी के सब जहाँ में नक़्शो नगीन हैं. कौड़ी न हो तो कौड़ी के फिर तीन तीन हैं [नज़ीर ])

 
        

Tuesday, April 14, 2020

Asasa:اثاثہ संपत्ति ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Asasa:اثاثہ संपत्ति 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

संपत्ति 

"कल आधी रात को मेरे घर में कोई चोर घुस आया और कमरे की अलमारियों की तलाशी लेने लगा।" प्रोफेसर खुर्शीद विद्यार्थियों से संभोधित हुआ। "चोर की आहट पाकर मैं ख़ामोश रहा। फिर चुपचाप बिस्तर से उठकर मैं उसके पीछे खड़ा हो गया और अलमारी पर टोर्च की रोशनी डाल दी। सामने अलमारी में किताबें ही किताबें थीं।" उसके बाद मैंने चोर से कहा, "भाई यही संपत्ति है मेरे पास। जो भी किताब पसंद आये उठा कर ले जाओ। मैं केवल रौशनी दिखा सकता हूँ।"
चोर की नज़र ज्यूंही मुझ पर पड़ी वह घबरा कर भागने की कोशिश करने लगा परन्तु मैं उसके रास्ते में खड़ा हो गया। "क्यों भारी लगती हैं क्या?"
उसने मेरे पैर पकड़ लिए और कहने लगा, "जनाब मुझे माफ़ कर दो, मैं ग़लत घर में घुस आया हूँ। मुझे जाने दो। इन किताबों से मेरा क्या काम?"
"यही तो ग़लतफ़हमी है तुम्हारी। इनसे दोस्ती की होती तो आधी रात को यहाँ चोरी करने नहीं आते।"        



Saturday, March 10, 2012

Prativad, प्रतिवाद : (Hindi); Kahani; Katha; कहानी

 Prativad, प्रतिवाद : (Hindi)
Kahani; Katha; कहानी  
   प्रतिवाद   


उस  दिन मैं कार से यात्रा कर रहा था. ड्राईवर को इस बात का एहसास था कि मुझे कॉन्फ्रेंस में देर हो रही है.इस लिए वह बहुत तेज़ी से गाड़ी चला रहा था. न जाने क्यों दिन कि शुरूआत उपशगुन से हुई थी. सुबह से ही घर में कुहराम मचा हुआ था. एक ओर बीवी की फरमाईशें ओर दूसरी ओर बच्चों की मांगें. दो चार दिन पहले पत्नी ने घरेलू कामों की लिस्ट थमा दी थी और आज सुबह सवेरे ही हिसाब मांगने लगी. बच्चों की फीस जमा करने की आखरी तारिख भी आज ही थी. यही नहीं मिलोनी की यूनिफार्म भी फट चुकी थी. इधर नौकरानी का पति पोलियोग्रस्त हो कर अस्पताल में भर्ती हो गया था और वह भी एडवांस वेतन मांग रही थी जैसे यह उत्तरदायित्व  भी मेरा ही था. यही कारण था कि घर में समाचारपत्र पढ़ने का समय भी नहीं मिला. मैंने समाचारपत्र अपने साथ उठा लिया ताकि रास्ते में पढ़ सकूँ.
संपादकीय पन्ने पर मेरे चहेते जर्नलिस्ट का लेख छपा था. लेख इतना रुचिकर था कि लेखक की उंगलियाँ चूमने को जी चाह रहा था. कितना निडर और निर्भीक पत्रकार था. कितनी सच्चाई थी उस के लेख में. उसने अकेले ही प्रशासन में हर तरफ फैले भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने का बीड़ा उठाया था. प्रशासन तंत्र की परतों को एक-एक करके वह उधेड़ता चला जा रहा था. मुझे उसकी निडरता और निर्भीकता पर गर्व था.
अन्तर्मन से आवाज़ आई. " अगर ऐसे ही दस पंद्रह कर्तव्यनिष्ट खोजी पत्रकार देश में पैदा हो जाएँ तो देश का भाग्य ही बदल जाए "
तत्पश्चात मैं अपने गिरेबान में झाँकने लगा.
इस बीच एकाएक गाड़ी जे जे कालोनी के पास तीव्र झटके के साथ रुक गयी. झटके के कारण मेरा समाचारपत्र हाथों से छूटकर कार की सीटों के बीच बिखर गया. 
"क्यों.... क्या हुआ.....? रुक क्यों गए?" समाचारपत्र समेटते हुए मैंने ड्राईवर से पुछा.
"सर गाड़ी के नीचे एक पिल्ला आ कर मर गया."
इतनी देर में सामने से एक बिफरी हुई काली कुतिया दौड़ती हुई चली आई और अपना खूंखार जबड़ा खोलकर श्वेत एम्बेसडर कार पर भोंकने लगी. हमारे इस देश की अफसरशाही में श्वेत एम्बेसडर का खूब प्रचलन है. इन एम्बेसडर कारों के सामने तो बड़े बड़ों की बोलती बंद हो जाती है फिर कुत्तों की क्या मजाल. मुझे यकीन था की कुतिया स्वयं ही थक हार कर चुप हो जाएगी. 
"शायद पिल्ले की माँ होगी ?" मैंने ड्राईवर से पुछा मगर उसने सुनी अनसुनी कर दी. इस दरमियान एक पुलिसकर्मी  कहीं से आ निकला और सलूट बजा कर कार को आगे बढ़ाने का इशारा करने लगा. 
ड्राईवर ने फिर से गाड़ी का इंजन स्टार्ट कर लिया और पहले की भांति ही अपनी गाड़ी दौड़ाने लगा. कुतिया वहीँ उसी स्थान पर भौंकती रह गयी मगर उस फौलादी ढांचे का कुछ नहीं बिगाड़ सकी. 
कांफ्रेंस समाप्त होने के बाद दिन के चार बजे जब हम उसी रास्ते से लौट रहे थे तो वही काली कुतिया न जाने कहाँ से फिर उसी स्थान पर प्रकट हो गयी. वह पागलों की तरह लगातार भौंकती और ललकारती हुई फुर्ती से अकस्मात कार के सामने आई. ड्राईवर स्टेरिंग पर नियंत्रण न रख सका और वह कुतिया भी गाड़ी के नीचे आकर लहुलुहान हो गयी.
गाड़ी थोड़ी देर बाद नियंत्रण में आ गयी और अपने आप ही रुक गयी.
वहां कुछ लोग एकत्रित हो गए. मैं गाड़ी से नीचे उतरा. अपने पीछे दृष्टि दौडाई. वहां सड़क पर कुतिया की तड़पती हुई लाश थी, बहता हुआ उसका गर्म गर्म रक्त और क्षतविक्षत अंतड़ियाँ नज़र आ रही थीं. उस के शरीर में अभी भी कंपन था और जबड़े से रक्त बहता चला जा रहा था.
कुछ लोग मेरी और ऐसे देख रहे थे जैसे मैं ही अपराधी हूँ. उनकी आँखों में विरोध की भावना थी. मगर श्वेत एम्बेसडर को देख कर वे चुप हो गए. मैं घबरा कर वापिस अपनी गाड़ी में बैठ गया.
"उन लोगों को ड्राईवर पर गुस्सा आना चाहिए था. मुझ पर क्यों?" कार में बैठ कर मैं अपने आप से पूछता रहा. 
" ड्राईवर पर क्यों? कार तो आप की है और फिर जल्दी दौड़ाने का आदेश भी आप का ही था." स्वयं ही उत्तर भी ढूंढ लिया.
क्षण भर के बाद उस काली कुतिया पर, जो एक माँ भी थी, मुझे बहुत तरस आया. उसने अपने बच्चे के मारने वाले के सामने विरोध प्रदर्शन किया था और ऐसा करते हुए अपनी जान भी गंवाई थी. कितनी साहसी माँ थी वह! 
"संभवतः उसने हमारी गाड़ी को पहचान लिया होगा." मैंने ड्राईवर से पुछा.
" हाँ साहब ऐसा ही लगता है जानवरों के बारे में यही सुना है कि उनकी याद्दाश्त बहुत तेज़ होती है. उनको थोड़ा सा आघात भी पहुँचाओ तो पलटकर काट लेते हैं. सांपों के बारे में तो मेरी अम्मां कहती थी कि मरते मरते भी वह मरने वाले की तस्वीर अपनी आँखों में उतार लेते हैं और फिर उनके बाल बच्चे उस व्यक्ति से बदला लेते हैं."
भीड़ में से किसी की आवाज़ गूँज उठी, " न जाने किस अंधे ने सुबह सवेरे इसके बच्चे को अपनी मोटर के नीचे रौंद डाला था. तब से बेचारी विक्षिप्त हो गयी थी और दिन भर आने जाने वाली गाड़ियों पर भौंकती फिरती थी."
देखने वाले कुतिया की लाश को देख कर त्राहि त्राहि कर रहे थे.
इस के बावजूद सड़क पर रात भर पहले की भांति ट्रैफिक चलता रहा. सभी अपनी अपनी मंजिल की और तेज़ गति से चले जा रहे थे.
रात भर सड़क पर लाश पड़ी सड़ती रही. यदाकदा गिद्ध और कौए उस में से मांस नोच कर ले जाते. राहगीर लाश की ओर देखना भी गवारा न करते. अपने मुंह को रुमाल से ढांप कर दूसरी ओर देखते और तेज़ तेज़ क़दमों से निकल जाते.
दुसरे दिन म्युनिसिपल कमेटी की कचरा गाड़ी लाश उठा कर ले गयी.
दो दिन पश्चात् समाचार पत्रों में बड़ा ही रोचक समाचार छपा. मेरे निडर, निर्भीक और सत्यनिष्ट पत्रकार ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद की शपथ ली और अब उसी प्रशासन का हिस्सा बन गया था जिसके विरुद्ध वह बरसों से आवाज़ उठाता रहा.

(कहानी संग्रह "चिनार के पंजे " Chandermukhi Prakashan, E-223, Shivaji Marg,Main Rd,Teesra Pusta, Jagjit Nagar, Delhi. tel-9250020816)Also available online.   

Tuesday, March 6, 2012

Tuesday, February 21, 2012

Surprise, سرپرائز : (Urdu/Hindi); Afsancha; Laghu Kahani; افسانچہ

 Surprise, سرپرائز :
(Urdu/Hindi)
Afsancha; Laghu Kahani; افسانچہ 
           
                                             
                                   सरप्राइज      

उस रोज़ जब मैं घर से निकला तो मेरी पत्नी बडी ही उत्सुकता से दरवाज़े तक आई. प्यार भरी नज़रों  से  मुझे देखा और फिर अलविदा कहने के लिए बोली. "गुड बय डार्लिंग, शाम को जल्दी आना, आज इवनिंग शो देख लेंगे।" वह कुछ ज्यादा ही मेहरबान लग रही थी। मैंने उसके गाल पर चुमी ली और जवाब में कहा,  "असंभव, आज ऑफिस में बहुत काम है. सात आठ बज जायेंगे।" दफ्तर पहुंचा तो मालूम हुआ कि बॉस  की तबियत ठीक नहीं है और वह दफ्तर नहीं आयेंगे। उनकी सारी इंगेजमेंट्स कैंसल करलीं। पूरी डाक उठा कर उनके घर पहुंचा। दिन का काम जल्दी जल्दी निपटा लिया. फिर सोचा चलो आज श्रीमती जी को ही सरप्रयज़  दें
दो ढाई बजे घर पहुंचा. कॉलबेल दबाई. कुछ देर के बाद दरवाज़ा खुला. सामने नाइट गाउन पहने मेरी बीवी उलझे हुए बालों को समेटती हुई आँखें मूँद रही थी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। "तुम, तुम इतनी जल्दी.....! सब ठीक तो है न?" उसके लहजे में ताजुब और परेशानी साफ़ नज़र आ रही थी. वह मुड कर अन्दर जाने लगी और मैं पीछे पीछे हो लिया। "खाना खाया है या फिर होम सरविस से मंगवा लूं?" डायनिंग टेबल पर बिखरे हुए बर्तनों की तरफ इशारा करते हुए वह कहने लगी,"दरअसल मेरी सहेली आरती आई थी और हम दोनों ने इकठे लंच कर लिया. वह ज़रा जल्दी में थी इस लिए ज्यादा दैर नहीं ठहर सकी।" मुझे उसकी बातों पर यकीन करने के सिवा और कोई चारा न था। मुझे एहसास हुआ कि मैं जल्दी वापस आकर उसकी प्राइवैसी में दखल अंदाज़ हुआ। डस्ट बिन में पडे हुए सिगरेट के टुकड़े उसकी बातों को झुटला रहे थे. या फिर ऐसा भी हो सकता है कि आरती सिगरेट पीने कि आदी हो. कौन जाने सच क्या है?