Friday, March 5, 2021

Zewrat Ka Dibba; गहनों का डिब्बा; زیورات کا ڈبہ ; Ministory;लघु कहानी;افسانچہ

Zewrat Ka Dibba; गहनों का डिब्बा; زیورات کا ڈبہ 
Ministory;लघु कहानी;افسانچہ 

गहनों का डिब्बा 

अपनी बहन की शादी में भाग लेकर सुमित्रा बरैली से मथुरा वापस आगई। घर में घुसते ही वह रोने बिसूरने लगी और अपने पति से कहने लगी, "मैं लुट  गई। बर्बाद हो गई। ट्रैन में मेरा सब कुछ लुट गया।"
पति ने गंभीरता से पुछा, "क्या लुट गया? बताओ तो सही।"
"रास्ते में किसी ने सूटकेस से मेरे गहनों का डिब्बा निकाल लिया।"
बरैली-कासगंज-मथुरा लाइन वैसे भी चोरी डकैती के लिए बदनाम है। इस पर अगर कोई गहने लेकर यात्रा करे, चोरों के लिए तो वरदान हो गया। पति ने कोई खास भावात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की बल्कि शांति से पुछा, "बच्चे कहाँ हैं?" 
"पीछे पीछे आ रहे हैं।"
"दोनों हैं.......? गिन कर लाई हो..... ?"
"आपको तो हर बात में दिल लगी सूझती है। किसी का घर जले कोई तापे।"
इतनी देर में दोनों बच्चों ने घर के अंदर प्रवेश किया। पति ने संतोष का सांस लिया और फिर बोलने लगा, "जो हुआ सो हुआ। जाओ, जा कर नहा लो। फ्रेश हो जाओगी।"
"मेरी जान पर बन आई है और आप के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। कितने कठोर हैं आप।"
पति ने खामोश रहना ही उचित समझा। फिर भी दिल में सोचने लगा, "अगर उसने  देखा होता और प्रतिक्रिया व्यक्त की होती तो ना जाने क्या हो जाता। संभवतः चोर खुद को बचने के लिए उसकी जान ले लेता और बच्चों का अपहरण कर लेता। फिर वे न जाने  इस वक़्त कहाँ भीख मांग रहे होते। ये तो भगवान का  शुक्र है कि केवल गहने चले गए, मेरे लाल तो बच गए।" परन्तु वह यह सब कुछ नहीं कह पाया।          



 

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