Monday, May 4, 2020

Pashemani;पश्चाताप;پشیمانی ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Pashemani;पश्चाताप;پشیمانی 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

पश्चाताप 
कुछ महीने पहले राजनाथ की अर्धांगिनी स्वर्गवास हो गयी और ढलती आयु में उसे तन्हाई का अत्यंत अनुभव हो रहा था। उसे याद आया को जब भी वह कोई आदेश देता सरला बिना किसी बहाने के उस पर शीघ्र कार्यवाही करती। कभी कभी वह नाराज़ होकर आपे से बाहर भी हो जाता मगर सरला ख़ामोशी से अपने आंसू पी जाती। 
दो दिन पहले मैं यूँही उसे मिलने गया  तो वह बहुत ही अनुतापी लग रहा था। उसकी आँखों में पहली बार आंसों नज़र आ रहे थे। पूछा क्या बात है? कहने लगा, "तुम्हें नहीं मालूम तुम्हारी आंटी को मैंने ज़िन्दगी भर बहुत कष्ट पुहंचाया। सारी उम्र वह मेरे उचित अनुचित आदेशों का पालन करती रही परन्तु मुंह से कभी उफ़ तक नहीं की। मुझे अब इस बात का एहसास हो रहा है कि मैंने उस के साथ बहुत ज़्यादती की जो मुझे नहीं करनी चाहिए थी। मुझे सरला के साथ अनुकंपा तथा सहानभूति से पेश आना चाहिए था। मगर अब तो वह चली गई  और गया समय वापस नहीं आता।  



















Saturday, May 2, 2020

Ziyafat;भोज;ضیافت ; Afsancha;लघु कहानी ;افسانچہ

Ziyafat;भोज;ضیافت 
 Afsancha;लघु कहानी ;افسانچہ 

भोज
निदेशक डाक सेवा की हैसियत से मैं अचानक एक दिन एक गांव के शाखा डाकघर का निरीक्षण करने चल पड़ा। साथ में एक इंस्पेक्टर था। वहां पहुँचते ही मालूम हुआ कि शाखा डाकपाल कई दिन पहले शहर जा चूका है और अपने बदले चचेरे भाई को काम पर छोड़ा है। बेचारा प्रशिक्षित तो था नहीं इस लिए ना हिसाब-किताब ढंग से रखा था और ना ही मेरे प्रश्नों का उत्तर दे पाया। 
इसी बीच में असली डाकपाल की पत्नी वहां आन पहुंची और छाती पीटती  हुई स्थानीय भाषा में तदर्थ डाकपाल को बुरा भला कहने लगी, "अरे मूर्ख, तुमने मुझे खबर क्यों नहीं की, मालूम नहीं तुम्हारा भाई आग बबूला हो जाए  गा? यह अफसर लोग जब भी आ जाते हैं हम उनकी आवभगत में  कोई कसर नहीं छोड़ते, उनके लिए फटाफट बतख कटवा कर स्वादिष्ट भोजन का प्रबंध करते हैं। यह लोग पेट भर कर ही यहाँ से चले जाते हैं।  तुमने तो भाई को मुंह दिखाने के योग्य ही नहीं रखा।"
चूंकि मैं स्थानीय भाषा जानता था इसलिए मुझे हंसी आगई। फिर उसे कहने लगा, "मोहतरमा, आप चिंता ना करें, वह जो निरीक्षण करने आते हैं बहुत बड़े अफसर होते हैं, मैं तो छोटा सा कर्मचारी हूँ कुछ जानकारी एकत्रित करने के लिए आया हूँ, बस पांच दस मिनट में वापस चला जाऊँ गा। आप निश्चिन्त अपने घर वापस चली जाइए।"
उसके बाद डाकपाल की पत्नी तदर्थ डाकपाल को बुरा भला कहती हुई चली गई। 

             


Friday, May 1, 2020

Masnooyi Tukhmrezi;कृत्रिम गर्भाधान; مصنوئی تخم ریزی ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Masnooyi Tukhmrezi;कृत्रिम गर्भाधान;
 مصنوئی تخم ریزی
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

कृत्रिम गर्भाधान 
बहुत वर्षों तक पति पत्नी बच्चे की प्रतीक्षा करते रहे। अंततः डॉक्टर ने उन की क्षति और निराशा को देखकर उन्हें परामर्श दिया की वे कृत्रिम गर्भधान के माध्यम से बच्चा पैदा करें। बहुत सोच विचार के बाद दोनों इस बात पर सहमत हो गए। 
सौभाग्य से उनके यहाँ  एक लड़का पैदा हुआ। दोनों को यह मालूम नहीं था कि शुक्राणु किसके थे मगर पिता को उम्र भर यह एहसास कचोटता रहा कि बच्चा उसका नहीं है इसलिए वह उसे वैसा प्यार नहीं दे सका जैसा एक बच्चे का अधिकार होता है। अलबत्ता माँ ऐसा नहीं कर पाई क्यूंकि वह उसकी कोख में नौ महीने रह चूका था और उसके शरीर का हिस्सा बन चुका था। 


Thursday, April 30, 2020

Kaudi Ke Teen Teen;कौड़ी के तीन तीन;کوڑی کے تین تین ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Kaudi Ke Teen Teen;कौड़ी के तीन तीन;
کوڑی کے تین تین 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

कौड़ी के तीन तीन
गरीबों की समस्याएं भी विचित्र होती हैं। मेरे फूफा जी श्रीनगर से साठ किलोमीटर दूर रहते थे। उनके जन्म दिन पर पिता जी उन्हें इक्यावन रुपए शगुन के तौर पर मेरे हाथ भेजना चाहते थे। एक दिन पहले दफ्तर जाते समय उन्होंने इकहत्तर रुपए मेरे हाथ में यह कहकर थमा दिए कि इक्यावन रुपए फूफा जी को देना और बीस रुपए बस में आने जाने का किराया। 
उस दिन मैं रात गए घर लौट आया कि रास्ते में एक चटाई विक्रेता मिल गया जिस के सिर पर केवल तीन घास की चटाइयां (वगुव) बची थीं। यह चटाइयां अत्यधिक ठंड से बचने के लिए बहुत लाभदायक होती हैं। मैंने यूँही क़ीमत पूछी तो उसने एक की क़ीमत सौ रुपए बताई और तीन ढाई सौ रुपए में देने को तैयार हो गया। मैंने कहा कि मेरे पास केवल सत्तर रुपए हैं, अगर तीनों दोगे तो खरीद लूँ गा। बहुत भाव-ताव के बाद वह मान गया और मैं तीनों चटाइयां लेकर जोशपूर्ण घर पहुँच गया। सोचा था पिता जी इतनी सस्ती चटाइयां देखकर बहुत प्रसन्न होंगे मगर वह तो आग बबूला हो गए। चूँकि महीना समाप्त होने में अभी दो दिन बाक़ी थे, उनके पास बस यही इकहत्तर रूपए बचे थे और उन्हें किसी से उधार लेना गवारा न था। 
दुसरे रोज़ प्रातः उठ कर ना जाने कहाँ से वह लाचारी में सत्तर रुपए उधार ले कर आए और मेरे हवाले कर दिए। उनके चेहरे पर सतत क्रोध और उदासी देख कर मुझे शर्म महसूस हो रही थी और एक कश्मीरी कहावत याद आ रही थी, 'हारि हुस करि क्या हारि रुस' (कौड़ी के सब जहाँ में नक़्शो नगीन हैं. कौड़ी न हो तो कौड़ी के फिर तीन तीन हैं [नज़ीर ])

 
        

Tuesday, April 28, 2020

Katba...!;शिलालेख;!...کتبہ ; Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ

Katba...!;शिलालेख;!...کتبہ 
 Afsancha;लघु कहानी;افسانچہ 

शिलालेख.....! 

यहाँ एक बेसहारा अनपढ़ औरत दफ़न है जो सारी उम्र अपने लेखक पति के झूठे आरोपों का उत्तर नहीं दे पाई। 


Jigree-My Kinship Carer Mother

       One mother gave me birth, and the other brought me up. I am more indebted to the latter, who looked after me from the age of twelve o...